भारत-EU FTA के बीच RBI ने डॉलर से दूरी बनाई, US बॉन्ड बेच सोना जमा किया; ट्रंप को लगी मिर्ची?

By Ravi Singh

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भारत और EU FTA समझौते के दौरान सोने के सिक्कों और अमेरिकी डॉलर के बीच तुलना दिखाती इमेज, जिसमें भारतीय झंडा और EU फ्लैग बैकग्राउंड में।
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भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की घोषणा के ठीक समय पर आरबीआई ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की होल्डिंग्स को 5 साल के न्यूनतम स्तर पर लाकर सोने की खरीदारी तेज की है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी घटी है और सोने का हिस्सा बढ़कर 17% हो गया है। यह कदम रुपये को मजबूत करने, भू-राजनीतिक जोखिम कम करने और वैश्विक वित्तीय विविधीकरण का संकेत देता है, जिससे अमेरिकी डॉलर की प्रधानता पर सवाल उठ रहे हैं और ट्रंप प्रशासन की चिंताएं बढ़ सकती हैं।

भारत-EU FTA: ऐतिहासिक समझौता और आर्थिक प्रभाव

भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने 26-27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में 16वें शिखर सम्मेलन के दौरान लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा FTA है, जो वैश्विक जीडीपी के एक चौथाई हिस्से और करीब 2 अरब लोगों को कवर करता है। समझौते के तहत 96.6% EU निर्यात पर भारत में टैरिफ कम या खत्म होंगे।

कारों पर टैरिफ 110% से घटाकर 10% तक, ऑटो पार्ट्स पर 5-10 साल में शून्य।

मशीनरी पर 44%, केमिकल्स पर 22% और फार्मास्यूटिकल्स पर 11% तक कटौती।

वाइन पर 150% से 20%, ऑलिव ऑयल पर 45% से शून्य (5 साल में), प्रोसेस्ड फूड पर 50% तक छूट।

संवेदनशील कृषि क्षेत्र जैसे बीफ, पोल्ट्री, चावल और चीनी को बाहर रखा गया है।

सेवाओं में वित्तीय सेवाएं और समुद्री परिवहन में भारत ने अब तक की सबसे बड़ी पहुंच दी है।

बौद्धिक संपदा संरक्षण मजबूत, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और श्रम अधिकारों पर अलग अध्याय।

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EU भारत को अगले दो साल में 500 मिलियन यूरो की मदद देगा ताकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम हो और सस्टेनेबल इंडस्ट्री ट्रांजिशन हो।

EU की ओर से यूर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच ऐतिहासिक साझेदारी” बताया और कहा कि यह नियम-आधारित व्यापार की जीत है। भारत के लिए यह EU में निर्यात दोगुना करने, 800,000 नौकरियां पैदा करने और 4 बिलियन यूरो सालाना टैरिफ बचत का मौका है। वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार 136.5 बिलियन डॉलर (2024-25) से आगे बढ़ेगा।

आरबीआई की रणनीति: US ट्रेजरी से दूरी, सोने की ओर झुकाव

आरबीआई ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की होल्डिंग्स को लगातार घटाया है। नवीनतम यूएस ट्रेजरी डेटा के अनुसार, लॉन्ग-टर्म होल्डिंग्स 174 बिलियन डॉलर पर पहुंच गईं, जो 2023 के पीक से 26% कम है और 5 साल का न्यूनतम स्तर है। अक्टूबर 2025 अंत तक कुल होल्डिंग्स 190 बिलियन डॉलर रही, जो पिछले साल से 50.7 बिलियन डॉलर कम है। ट्रेजरी अब विदेशी मुद्रा भंडार का करीब एक-तिहाई हिस्सा हैं, जबकि एक साल पहले यह 40% था।

इसके उलट सोने की खरीदारी तेज हुई है। जनवरी 16, 2026 तक गोल्ड रिजर्व 117.45 बिलियन डॉलर पर पहुंचा, जो पिछले हफ्ते से 4.62 बिलियन डॉलर ज्यादा है। कुल विदेशी मुद्रा भंडार 701.36 बिलियन डॉलर है, जिसमें सोने का हिस्सा 17% हो गया (पिछले साल 12% था)। भारत दुनिया का 7वां सबसे बड़ा गोल्ड होल्डर बन चुका है।

विदेशी मुद्रा भंडार का ताजा ब्रेकअप (जनवरी 16, 2026 तक)

क्यों हो रहा है यह बदलाव?

मदराशि (अरब डॉलर)साप्ताहिक बदलाव
कुल विदेशी मुद्रा भंडार701.36+14.17
सोना117.45+4.62
SDR(स्लाइट गिरावट)-0.035
US ट्रेजरी (लॉन्ग-टर्म अनुमानित)~174निरंतर गिरावट

रुपये को मजबूती : रुपये हाल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, खासकर अमेरिकी टैरिफ (कुछ क्षेत्रों में 50%) और व्यापार तनाव के कारण। ट्रेजरी बेचकर रुपये खरीदकर हस्तक्षेप किया जा रहा है।

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विविधीकरण : डॉलर-आधारित एसेट्स पर निर्भरता कम कर जोखिम घटाना। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के रिजर्व फ्रीज होने से सबक लिया गया।

भू-राजनीतिक जोखिम : अमेरिका के प्रतिबंधों का खतरा, खासकर रूसी तेल आयात पर 25% अतिरिक्त टैरिफ।

वैश्विक ट्रेंड : चीन, ब्राजील जैसे देश भी ट्रेजरी घटा रहे हैं। सेंट्रल बैंक गोल्ड की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि यह सुरक्षित और स्वतंत्र एसेट है।

ट्रंप प्रशासन पर असर: डी-डॉलराइजेशन की चिंता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BRICS देशों को डॉलर से दूर जाने पर 100% टैरिफ की चेतावनी दी है। उनका मानना है कि डॉलर की वैश्विक प्रधानता अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। भारत का यह कदम – EU के साथ मजबूत व्यापार समझौता और साथ ही डॉलर एसेट्स घटाना – ट्रंप की नीतियों के खिलाफ एक रणनीतिक काउंटर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की टैरिफ और संरक्षणवादी नीतियां ही देशों को डॉलर से दूर धकेल रही हैं, जिससे गोल्ड की मांग बढ़ी है। भारत का EU FTA अमेरिकी दबाव के बीच वैकल्पिक साझेदारियों का संकेत है।

यह बदलाव भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में नए संतुलन की ओर इशारा करता है।

Disclaimer: यह समाचार रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है और निवेश या वित्तीय निर्णय के लिए सलाह नहीं है।

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Ravi Singh

मेरा नाम रवि सिंह है, मैं एक कंटेंट राइटर के तौर पर काम करता हूँ और मुझे लेख लिखना बहुत पसंद है। 4 साल के ब्लॉगिंग अनुभव के साथ मैं हमेशा दूसरों को प्रेरित करने और उन्हें सफल ब्लॉगर बनाने के लिए ज्ञान साझा करने के लिए तैयार रहता हूँ।

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