“वैश्विक बाजार में सोना और चांदी की तेजी फिलहाल थम गई है, जबकि कच्चे तेल में नई उछाल की संभावना मजबूत हो रही है। ब्रेंट क्रूड 71 डॉलर के पार पहुंच चुका है और एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर 66 डॉलर का रेजिस्टेंस टूटता है तो कीमतें 72-73 डॉलर तक जा सकती हैं, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल पर असर पड़ सकता है।”
कच्चे तेल में तेजी की नई लहर?
वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 71.35 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है, जो पिछले दिन से 1.42% की बढ़ोतरी दर्शाती है। इसी तरह WTI क्रूड 66.11 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है, जिसमें 1.49% का उछाल आया है। पिछले एक महीने में ब्रेंट में करीब 9.9% और WTI में 9.5% की तेजी देखी गई है, हालांकि सालाना आधार पर अभी भी 6-8% की गिरावट बनी हुई है।
MCX पर भारतीय बाजार में क्रूड ऑयल फ्यूचर 6007 रुपये प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है, जो पिछले सेशन से 1.76% ऊपर है। स्पॉट प्राइस 5664 रुपये के स्तर पर है। यह तेजी मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट में अमेरिका-ईरान तनाव और वेनेजुएला से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण आई है, जिससे सप्लाई चेन में चिंता बढ़ गई है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोना और चांदी के रैली के बाद अब कमोडिटी मार्केट का फोकस क्रूड पर शिफ्ट हो गया है। एक प्रमुख एनालिस्ट के अनुसार, अगर क्रूड 66 डॉलर के महत्वपूर्ण रेजिस्टेंस लेवल को ब्रेक करता है तो अगले कुछ हफ्तों में यह 72-73 डॉलर तक पहुंच सकता है। RSI इंडिकेटर 50 के ऊपर बने रहने से बुलिश मोमेंटम मजबूत दिख रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार साबित हो सकती है। एक ओर जहां सस्ता क्रूड (पिछले कुछ महीनों में 50-60 डॉलर रेंज की भविष्यवाणियां) महंगाई को काबू में रखने और पेट्रोल-डीजल को सस्ता करने में मदद करता, वहीं अब तेजी से बढ़ती कीमतें आयात बिल बढ़ा सकती हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड आयातक है और इसकी जरूरतें मुख्य रूप से ब्रेंट से जुड़ी होती हैं।
2026 में क्रूड कीमतों का अनुमान
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और एक्सपर्ट्स 2026 के लिए मिश्रित अनुमान दे रहे हैं:
अधिकांश सर्वे में ब्रेंट क्रूड का औसत 61-62 डॉलर प्रति बैरल रहने की उम्मीद है, जो सप्लाई बढ़ने से दबाव में आएगा।
कुछ संस्थानों जैसे DBS बैंक ने 68 डॉलर तक का अनुमान लगाया है, जबकि EIA और J.P. Morgan 56-58 डॉलर के आसपास देख रहे हैं।
हालांकि शॉर्ट टर्म में जियोपॉलिटिकल रिस्क (ईरान, वेनेजुएला, रूस पर संभावित नए प्रतिबंध) से कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
OPEC+ की उत्पादन नीति और गैर-OPEC देशों (खासकर अमेरिका शेल ऑयल) से सप्लाई बढ़ने से लंबे समय में कीमतें नीचे आ सकती हैं।
भारत में डिमांड ग्रोथ मजबूत बनी हुई है, एशिया में 2026 में 0.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जो कीमतों को सपोर्ट कर सकती है।
भारतीय बाजार पर असर
यदि क्रूड में यह तेजी जारी रहती है तो पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम बढ़ जाएगा, हालांकि सरकार टैक्स कटौती या सब्सिडी से इसे बैलेंस कर सकती है। वहीं अगर तनाव कम होता है तो कीमतें 60-61 डॉलर तक गिर सकती हैं, जो आम आदमी के लिए राहत होगी।
कमोडिटी ट्रेडर्स को सलाह है कि 66 डॉलर के ब्रेकआउट पर नजर रखें, क्योंकि यह तेजी की पुष्टि करेगा। लंबे समय के निवेशकों के लिए वैश्विक सप्लाई-डिमांड बैलेंस और OPEC+ फैसलों पर फोकस जरूरी है।






