“केंद्रीय बजट 2026-27 में आठवें वेतन आयोग के लिए कोई वित्तीय प्रावधान नहीं किया गया है, क्योंकि आयोग का गठन हाल ही में हुआ है और यह अभी प्रारंभिक चरण में है। व्यय सचिव टीवी सोमनाथन ने यह बयान देकर सरकारी कर्मचारियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जबकि स्थापना व्यय में मामूली वृद्धि केवल डीए और नई नियुक्तियों के लिए बताई गई है। इससे लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों पर असर पड़ेगा, लेकिन सरकार रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रही है।”
केंद्रीय व्यय सचिव टीवी सोमनाथन ने स्पष्ट रूप से कहा कि आठवें वेतन आयोग के लिए बजट में कोई विशेष प्रावधान नहीं रखा गया है। उन्होंने पीटीआई को दिए साक्षात्कार में बताया कि आयोग ने अपना कार्य अभी शुरू किया है और यह शुरुआती दौर में है, इसलिए बजट में इसकी सिफारिशों को ध्यान में रखकर कोई अतिरिक्त आवंटन नहीं किया गया। यह बयान ऐसे समय आया है जब लाखों केंद्रीय सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी नई वेतन संरचना की उम्मीद कर रहे थे, क्योंकि सातवें वेतन आयोग की अवधि समाप्त हो चुकी है।
आठवें वेतन आयोग का गठन पिछले साल अक्टूबर में कैबिनेट द्वारा अनुमोदित किया गया था, जिसमें वेतन संरचना, भत्तों और पेंशन योजनाओं की समीक्षा का दायित्व सौंपा गया है। आयोग को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीनों का समय दिया गया है, लेकिन लागू होने की तारीख अभी अस्पष्ट है। व्यय सचिव के अनुसार, बजट में स्थापना व्यय (establishment expenditure) को बढ़ाकर 8,24,114 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो पिछले वर्ष के 7,82,701 करोड़ रुपये से 41,413 करोड़ रुपये अधिक है। हालांकि, यह वृद्धि मुख्य रूप से महंगाई भत्ते (DA) की बढ़ोतरी और नई नियुक्तियों के लिए है, न कि आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन के लिए।
कर्मचारी संगठनों ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉयीज़ के एक प्रतिनिधि ने कहा कि यह फैसला कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर करेगा, खासकर बढ़ती महंगाई के दौर में। उन्होंने मांग की कि सरकार आयोग की रिपोर्ट को जल्द से जल्द अंतिम रूप दे और रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव से लागू करे। वहीं, पेंशनर्स एसोसिएशन ने चिंता जताई कि बिना प्रावधान के पेंशन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाएगी, जो वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित करेगी।
आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों से प्रभावित होने वाले प्रमुख क्षेत्रों में रक्षा बल, रेलवे कर्मचारी, सिविल सर्विसेज और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम शामिल हैं। अनुमान है कि यदि आयोग 25-30 प्रतिशत वेतन वृद्धि की सिफारिश करता है, तो सरकारी खजाने पर सालाना 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बोझ पड़ेगा। लेकिन व्यय सचिव ने जोर दिया कि बजट में विकास परियोजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलेगी और अप्रत्यक्ष रूप से कर्मचारियों को लाभ होगा।
पिछले वेतन आयोगों की तुलना में देखें तो सातवें वेतन आयोग ने 23.55 प्रतिशत की औसत वृद्धि की थी, जो 2016 से लागू हुई। छठे आयोग ने 2006 में 20 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिश की थी। आठवें आयोग से उम्मीद है कि यह महंगाई दर, जीडीपी ग्रोथ और कर्मचारी उत्पादकता को ध्यान में रखकर न्यूनतम वेतन को 18,000 रुपये से बढ़ाकर 26,000 रुपये तक कर सकता है, लेकिन बिना बजट प्रावधान के यह देरी का शिकार हो सकता है।
पिछले वेतन आयोगों का तुलनात्मक विश्लेषण (तालिका):
| वेतन आयोग | गठन वर्ष | लागू वर्ष | औसत वेतन वृद्धि (%) | प्रमुख सुधार |
|---|---|---|---|---|
| छठा | 2004 | 2006 | 20 | पेंशन स्कीम में बदलाव, ग्रेड पे सिस्टम |
| सातवां | 2013 | 2016 | 23.55 | फिटमेंट फैक्टर 2.57, DA मर्जर |
| आठवां | 2025 | अनिश्चित | अनुमानित 25-30 | डिजिटल भत्ते, रिमोट वर्क अलाउंस (अनुमानित) |
इस तालिका से स्पष्ट है कि प्रत्येक आयोग ने वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि की, लेकिन क्रियान्वयन में समय लगा। आठवें आयोग के मामले में, व्यय सचिव के बयान से लगता है कि सरकार आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है, विशेषकर वैश्विक मंदी और घरेलू मुद्रास्फीति के दबाव में।
आठवें वेतन आयोग से जुड़े प्रमुख बिंदु:
वेतन संरचना में बदलाव: न्यूनतम बेसिक पे में 44 प्रतिशत तक की संभावित वृद्धि, फिटमेंट फैक्टर को 3.0 तक बढ़ाने की मांग।
भत्तों की समीक्षा: हाउस रेंट अलाउंस (HRA) को शहरों के आधार पर 30 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही ट्रांसपोर्ट अलाउंस में ईवी सब्सिडी शामिल।
पेंशन प्रभाव: ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली की मांग मजबूत, लेकिन NPS में सुधार की संभावना अधिक।
कर्मचारी संख्या: लगभग 48 लाख केंद्रीय कर्मचारी और 68 लाख पेंशनभोगी प्रभावित होंगे।
आर्थिक प्रभाव: यदि लागू होता है, तो जीडीपी के 0.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त व्यय, लेकिन उत्पादकता में वृद्धि से ऑफसेट हो सकता है।
व्यय सचिव ने आगे कहा कि सरकार आयोग की प्रगति पर नजर रखे हुए है और आवश्यकता पड़ने पर अंतरिम राहत प्रदान कर सकती है, जैसे DA में अतिरिक्त बढ़ोतरी। वर्तमान में DA 50 प्रतिशत है, जो जुलाई में 53 प्रतिशत तक जा सकता है। लेकिन कर्मचारी संगठन इससे संतुष्ट नहीं हैं और संसद सत्र में इस मुद्दे को उठाने की योजना बना रहे हैं।
राज्यों के स्तर पर भी आठवें वेतन आयोग का प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि कई राज्य केंद्रीय सिफारिशों को अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य पहले ही अपनी वेतन समितियां गठित कर चुके हैं, लेकिन केंद्रीय बजट में प्रावधान न होने से उनका क्रियान्वयन प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयोग की रिपोर्ट 2027 तक आती है, तो रेट्रोएक्टिव भुगतान से एरियर की राशि करोड़ों में पहुंच सकती है।
संभावित चुनौतियां और समाधान:
चुनौती 1: महंगाई का दबाव – समाधान: आयोग को CPI डेटा पर आधारित फॉर्मूला अपनाना।
चुनौती 2: बजटीय घाटा – समाधान: गैर-जरूरी व्यय में कटौती और टैक्स रेवेन्यू बढ़ाना।
चुनौती 3: असमानता – समाधान: निम्न ग्रेड कर्मचारियों को अधिक फोकस, जैसे मिनिमम वेज को 30,000 रुपये तक।
चुनौती 4: डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन – समाधान: नए भत्ते जैसे साइबर सिक्योरिटी अलाउंस और वर्क फ्रॉम होम सपोर्ट।
यह स्थिति सरकारी कर्मचारियों के मनोबल पर असर डाल सकती है, लेकिन व्यय सचिव ने आश्वासन दिया कि सरकार कर्मचारियों की भलाई को प्राथमिकता देती है और आयोग की सिफारिशें आने पर त्वरित कार्रवाई करेगी।
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