“भारत सरकार FY 2025-26 में ब्याज के रूप में 12.76 लाख करोड़ रुपये चुकाएगी, जो मुकेश अंबानी की 10.17 लाख करोड़ रुपये की कुल संपत्ति से अधिक है। देनदारियों की सूची में बाजार ऋण, ट्रेजरी बिल, बाहरी ऋण और छोटी बचतें प्रमुख हैं, कुल देयताएं 196.79 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।”
भारत सरकार की वार्षिक ब्याज देयता मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति से आगे निकल चुकी है। FY 2025-26 के बजट अनुमान में ब्याज भुगतान 12,76,338 करोड़ रुपये तक पहुंचेगा, जबकि अंबानी की नेट वर्थ लगभग 10.17 लाख करोड़ रुपये (113 अरब डॉलर पर आधारित) है। यह अंतर सरकारी खर्च के 25% हिस्से को ब्याज पर केंद्रित करता है, जो कुल व्यय 50,65,345 करोड़ रुपये का हिस्सा है।
देनदारियों की संरचना में आंतरिक ऋण प्रमुख है, जो कुल का बड़ा हिस्सा बनाता है। बाहरी ऋण ऐतिहासिक दर पर गणना किया जाता है, जो मुद्रा जोखिम को प्रभावित करता है। छोटी बचत योजनाएं जैसे PPF और NSC आम नागरिकों से फंड जुटाती हैं, लेकिन इन पर ब्याज दरें बढ़ती महंगाई से जुड़ी हैं।
| देनदारी का प्रकार | अनुमानित राशि (लाख करोड़ रुपये में, FY 2025-26 अंत तक) | प्रतिशत हिस्सा (कुल देनदारियों का) |
|---|---|---|
| बाजार ऋण (Market Loans) | 120.5 | 61% |
| ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) | 15.2 | 8% |
| बाहरी ऋण (External Debt) | 10.8 | 5% |
| छोटी बचतें और प्रोविडेंट फंड (Small Savings & Provident Funds) | 35.4 | 18% |
| अन्य देयताएं (Reserve Funds & Deposits) | 14.9 | 8% |
| कुल | 196.79 | 100% |
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सरकारी देनदारियां GDP के 56.1% तक पहुंच सकती हैं, जो फिस्कल डेफिसिट को 4.4% पर रखने की चुनौती बढ़ाती हैं। बाजार से उधार लेने पर निर्भरता ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती है, जहां RBI की नीतियां सीधा असर डालती हैं।
बाहरी देनदारियां डॉलर मजबूत होने पर बढ़ सकती हैं, जबकि आंतरिक देनदारियां बॉन्ड यील्ड से जुड़ी हैं। छोटी बचतें नागरिकों के लिए सुरक्षित विकल्प हैं, लेकिन सरकार के लिए ये लंबी अवधि की देयता बन जाती हैं। फिस्कल कंसोलिडेशन के तहत 2026-27 से डेट-टू-GDP रेशियो को प्राथमिक लक्ष्य बनाने की योजना है, जो राजस्व वृद्धि पर निर्भर करेगी।
प्रमुख चुनौतियां:
बढ़ती ब्याज देयता से कैपिटल एक्सपेंडिचर पर दबाव, जो इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को प्रभावित करता है।
महंगाई नियंत्रण के लिए RBI की दरें ऊंची रखने से उधार लागत बढ़ती है।
राज्यों की देनदारियां कुल को 78% GDP तक ले जा सकती हैं, जो केंद्र-राज्य समन्वय की मांग करती है।
कर संग्रह में सुधार से देयताओं को कम किया जा सकता है, जहां GST और डायरेक्ट टैक्स पर फोकस जरूरी है।
Disclaimer: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है और किसी भी निवेश या वित्तीय निर्णय के लिए सलाह नहीं है।






